सोचता हूँ अगली ट्रिप माँ के साथ करूँगा
ट्रिप चाहे वो नई जगह का होया वैष्णो देवी जाने का हो
या ताजमहल घूमने जाना हो
कम से कम महाकाल के दर्शन के बहाने
बनारस ही साथ घूम आएँ
लेकिन माँ मना करती रहती हैं
कहती हैं कि घर की देखभाल कौन करेगा
घर में सैकड़ों गमले हैं, उन्हें पानी कौन देगा
एक प्यारी गैया है, उसे खाना कौन देगा
प्यास बुझाने मैना और कबूतर आते हैं,
उन्हें दाना-पानी कौन देगा
मैं चुप हो जाता हूँ
चुपचाप चला जाता हूँ
टीवी देखते वक्त
कभी-कभी केरल या हिमाचल के अनुभव देखता रहता हूँ
चाय पीते-पीते माँ भी 2 मिनट के लिए सुस्ताते हुए टीवी देख लेती हैं
मैं फिर अपना राग अलापता हूँ
चलो माँ, कम से कम बोधगया तो चलो,
नहीं चलना है दिल्ली तो कम से कम कलकत्ता तो चलो
बहुत कुछ है देखने को दुनिया में
मैं अपनी आँखों से दुनिया कैसे देखता हूँ
वो मेरे साथ चलकर तो देखो ज़रा
वहाँ रिश्तेदारों से भी मिल लेना
फिर डाँट देती हैं
कह देती हैं
“यह घर क्या कम है
यह गाँव क्या हमें अच्छे से हवा-पानी नहीं दे रहा है
जो तुम बाहर जाने की बात करते हो”
“तुम घूम आओ अपने दोस्तों के साथ
मेरे बदले में तुम चले जाओ
रायपुर चले जाना, वहाँ से बस्तर
दंतेश्वरी माँ के दरबार में फूल चढ़ा आना”
#prashantsamajik
This Mother’s day I was thinking that while everyone have their plans on exploration and itineraries ready, I too am part of a sustainable travel movement startup @agoraecotourism but can’t convince my mother to explore with me. Mothers simply live a life with choices hard to take.
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