Sunday, May 10, 2026

Mother's Day




 सोचता हूँ अगली ट्रिप माँ के साथ करूँगा

ट्रिप चाहे वो नई जगह का हो
या वैष्णो देवी जाने का हो
या ताजमहल घूमने जाना हो
कम से कम महाकाल के दर्शन के बहाने
बनारस ही साथ घूम आएँ

लेकिन माँ मना करती रहती हैं

कहती हैं कि घर की देखभाल कौन करेगा
घर में सैकड़ों गमले हैं, उन्हें पानी कौन देगा

एक प्यारी गैया है, उसे खाना कौन देगा

प्यास बुझाने मैना और कबूतर आते हैं,
उन्हें दाना-पानी कौन देगा

मैं चुप हो जाता हूँ
चुपचाप चला जाता हूँ

टीवी देखते वक्त
कभी-कभी केरल या हिमाचल के अनुभव देखता रहता हूँ
चाय पीते-पीते माँ भी 2 मिनट के लिए सुस्ताते हुए टीवी देख लेती हैं
मैं फिर अपना राग अलापता हूँ
चलो माँ, कम से कम बोधगया तो चलो,
नहीं चलना है दिल्ली तो कम से कम कलकत्ता तो चलो

बहुत कुछ है देखने को दुनिया में
मैं अपनी आँखों से दुनिया कैसे देखता हूँ
वो मेरे साथ चलकर तो देखो ज़रा
वहाँ रिश्तेदारों से भी मिल लेना

फिर डाँट देती हैं
कह देती हैं
“यह घर क्या कम है
यह गाँव क्या हमें अच्छे से हवा-पानी नहीं दे रहा है
जो तुम बाहर जाने की बात करते हो”

“तुम घूम आओ अपने दोस्तों के साथ
मेरे बदले में तुम चले जाओ
रायपुर चले जाना, वहाँ से बस्तर
दंतेश्वरी माँ के दरबार में फूल चढ़ा आना”

#prashantsamajik

This Mother’s day I was thinking that while everyone have their plans on exploration and itineraries ready, I too am part of a sustainable travel movement startup @agoraecotourism but can’t convince my mother to explore with me. Mothers simply live a life with choices hard to take.
#mothersdayspecial❤️ #AgoraEcotourism #TravelWithMa 
Stay updated about latest sustainable tourism initiatives - https://agoraecotourism.com/

Saturday, May 02, 2026

दिख जाना

 आज वह फिर दिखी,

 थोड़ी-थोड़ी,

 ज्यादा नहीं, 

रौशनी बिखेरती हुई 

 शाम का वक्त,

 कोई आम शाम नहीं,

 बारिश से नहाया हुआ, 

ठंडी बयार का बहना , 

आसमान जितना साफ हो सकता था 

उससे ज्यादा साफ था। 

ऐसे में 

वर्षों बाद फिर दिख जाना 

मन को तसल्ली और प्रेम से भर गया। 

"आज वह फिर दिखी" से अभीप्राय है 

अक्सर वह दिखती नहीं 

लेकिन ऐसे ही किसी शाम में 

आख़िरी बार दिखी थी, 

जब मन प्रसन्नचित था,

 मौसम ऐसा था जिसे याद किया जा सके। 

दिनभर का थकान 

किसी क्षण गायब हुआ था, 

सूर्य की लालिमा 

आसमान को रंगीन किए जा रही थी, 

ऐसे में टिमटिमाती हुई 

उसका दिख जाना 

मेरे लिए सुखप्रद था, 

मन और धरती पर

 कोई बोझ नहीं रह गया था

 उस शाम।

#prashantsamajik 


( वैशाख की असहनीय गर्मी के बाद पूर्णिमा के एक शाम पहले भरी बारिश का होना और अगले शाम घास पर एक भगजोगनी का दिखना )

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